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जानिए भारत देश के गौरवशाली व्यक्तित्व -नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के बारे में

Stone temples at Jageshwar, Almora
Photo creditUttarakhand collection · context photograph · PradeepBisht · CC BY-SA 4.0 · Resized, WebP conversion and display crop. Same license as original.

Diwakar · 2021-01-23

सुभाष चंद्र बोस जयंती 2021 : पराक्रम दिवस के अवसर पर जानें नेताजी के बारे में कुछ विशेष तथ्य - 23 जनवरी 1897  की तारीख स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक होने की साथ साथ जीवटता और दूरदर्शक  सुभाषचंद्र बोस का जन्म की तारीख के नाम से जानी जाती है, इस दिन नेता जी ओडिशा, बंगाल डिविजन के कटक में प्रसिद्ध वकील जानकीनाथ तथा प्रभावती देवी के घर अवतरित हुए।  तुम मुझे खून दो, मैं तुम्‍हें आजादी दूंगा....! जय हिन्द! जैस नारों से आजादी की लड़ाई को नई ऊर्जा देने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज 125वीं जयंती है। सुभाष चंद्र बोस जिन्हें नेता जी नाम से भी जाना जाता है, भारत के उन महान स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल हैं, जिनसे आज के दौर का युवा वर्ग प्रेरणा लेता है। सरकार ने नेताजी को जन्मदिन को पराक्रम दिवस के तौर पर मनाने की घोषणा की है। लेते हैं उनके जीवन की कुछ झलकियाँ - प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियां और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी 9वीं संतान और 5वें बेटे थे। आपने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल से ली। तत्पश्चात, सुभाष जी की शिक्षा कोलकाता के प्रेजीडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई। इसके बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा (इंडियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया। 1920 में आपने इंग्लैंड में सिविल सर्विस परीक्षा पास की (प्रतिष्ठित आईसीएस परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त करके उन्होंने केवल इसलिए त्यागपत्र दिया था क्योंकि उनको इंग्लैंड की महारानी के सामने शीश झुकाना मंजूर नहीं था।) परंतु भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में हिस्सा लेने के लिए उन्होंने वो नौकरी छोड़ दी थी। सिविल सर्विस छोड़ने के बाद वह देश के अंग्रेजों के चंगुल से आजाद कराने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए। जलियांवाला बाग हत्याकांड की घटना से वह काफी विचलित थे। कांग्रेस में महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे, तो वहीं सुभाष चंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय थे। समान लक्ष्य होने के बावजूद नेताजी और गांधी जी की विचारधारा में अंतर था। हालांकि, दोनों का मकसद सिर्फ और सिर्फ एक था कि भारत को आजाद कराया जाए। नेताजी का ऐसा मानना था कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए सशक्त क्रांति की आवश्यकता है, तो वहीं गांधी अहिंसक आंदोलन में विश्वास करते हैं। 1921 से 1941 के दौरान वो पूर्ण स्वराज के लिए कई बार जेल भी गए थे। उनका मानना था कि अहिंसा के जरिए स्वतंत्रता नहीं पाई जा सकती। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने सोवियत संघ, नाजी जर्मनी, जापान जैसे देशों की यात्रा की और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सहयोग मांगा। बोस बेहद ही साहसी व्यक्ति थे। उनके साहस का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि, भारत की स्वतंत्रता के लिए वो अंग्रेज़ों को चकमा देके अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के ख़तरनाक रास्तों से होते हुए जर्मनी आए, हिटलर से मुलाक़ात की, आज़ाद हिंद फौज की स्थापना की, पनडुब्बी द्वारा जापान पहुँचे, आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना की और अपनी सेना के साथ उत्तर पूर्व भारत में मणिपुर तक आ पहुँचे। उन्होंने आजाद हिंद रेडियो स्टेशन जर्मनी में शुरू किया और पूर्वी एशिया में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया। सुभाष चंद्र बोस मानते थे कि भगवत गीता उनके लिए प्रेरणा का मुख्य श्रोत थी। अंग्रेजों से भारत को आजाद कराने के लिए नेताजी ने 21 अक्टूबर 1943 को "आजाद हिंद सरकार" की स्थापना करते हुए 'आजाद हिंद फौज' का गठन किया। इसके बाद सुभाष चंद्र बोस अपनी फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा (अब म्यांमार) पहुंचे। यहां उन्होंने नारा दिया 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।' 18 अगस्त, 1945 को ताइपेई में हुई एक विमान दुर्घटना के बाद नेताजी लापता हो गए थे। घटना को लेकर तीन जांच आयोग बैठे, जिसमें से दो जांच आयोगों ने दावा किया कि दुर्घटना के बाद नेताजी की मृत्यु हो गई थी। जबकि न्यायमूर्ति एमके मुखर्जी की अध्यक्षता वाले तीसरे जांच आयोग का दावा था कि घटना के बाद नेताजी जीवित थे। इस विवाद ने बोस के परिवार के सदस्यों के बीच भी विभाजन ला दिया था। नेताजी सच में एक साधक थे और उनका जीवन अध्यात्म और दर्शन की ऐसी जमा पूंजी है जिसके तेज़ से आज का हर युवा प्रकाशमान हो सकता है। योग और अध्यात्म का उनके मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव था। बचपन में उनके द्वारा बनाई एक टोली धर्म स्थानों और गुरुओं की शरण में जाती थी, वो कॉलरा के मरीज़ों की सेवा करते थे। इस दौरान भारत में व्याप्त ग़रीबी देख कर उनका मन बहुत क्षुब्ध होता। अपने घर के बाहर एक वृद्ध महिला को भिक्षा माँगते देख उनके मन में अपार पीड़ा हुई और वो अपनी वेदना प्रकट करते हुए लिखते हैं "मैं उस वृद्धा के सामने इतना समृद्ध दिखता था की मेरे अंदर एक अपराध बोध पैदा हो गया.....किसी भी प्रकार के योग का क्या महत्व है यदि संसार में इतना दुःख व्याप्त रहे?" 16 अगस्त 1945 को टोक्यो के लिए निकलने पर ताइहोकु हवाई अड्डे पर नेताजी का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और स्वतंत्र भारत की अमरता का जयघोष करने वाले, भारत मां का दुलारे सदा के लिए, राष्ट्रप्रेम की दिव्य ज्योति जलाकर अमरता को प्राप्त हुए। हालाकि नेता जी की मृत्यु पर जानकारों के अलग अलग मत हैं। 100 गोपनीय दस्तावेज अब सार्वजनिक है। 2016 में प्रधानमंत्री मोदी ने सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी सौ गोपनीय फाइलों का डिजिटल संस्करण सार्वजनिक किया, ये दिल्ली स्थित राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद हैं।
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