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गंगा नदी की डॉल्फिन का संरक्षण है जरूरी

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Uttarakhand collection · context photograph · PradeepBisht · CC BY-SA 4.0 · Resized, WebP conversion and display crop. Same license as original.sunaina · 2020-09-07
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त के दिन लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था कि, जिस प्रकार टाइगर और एलीफेंट के संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलिफेंट है उसी प्रकार डॉल्फिन के संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट डॉल्फिन है। डॉल्फिन गंगा नदी में पाई जाती है, यह मात्र मछली ही नहीं एक स्तनधारी जीव भी है।
उन्होंने लोगों से कहा कि गंगा को दूषित करने से मानव के साथ-साथ डॉल्फिन को भी नुकसान पहुंचेगा। डॉल्फिन संकटग्रस्त प्रजाति की स्तनधारी जीव है, इसके संरक्षण के लिए ही डॉल्फिन प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है।
संकटग्रस्त स्तनधारी जीव होने के कारण डॉल्फिन को वन्य जीव संरक्षण संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची 1 में शामिल किया गया है। डॉल्फिन को मारा जाना संगीन अपराध माना जाएगा, इसके लिए सजा का भी प्रावधान है।
डॉल्फिन जैव विविधता के लिए आवश्यक जीव है, जिसका संरक्षण करने पर जैव विविधता को बढ़ावा तो मिलेगा ही, साथ ही साथ पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
गंगा नदी में पाई जाने वाली डॉल्फिन (प्लेटेनिस्टा गैंजेटिका) सोंस के नाम से जानी जाती है। बीते कुछ सालों में डॉल्फिन की संख्या में भारी गिरावट आई है, क्योंकि वर्तमान में नदियों में अनेकों निर्माणाधीन कार्य होते रहते हैं, कभी बांध बनाना, कभी बैराज बनाना, और प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ने से आए दिन डॉल्फिन की संख्या में कम होती जा रही है। वर्तमान में 2000 से भी कम डॉल्फिन शेष है, जिनके संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्राकृतिक संरक्षण कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है।
गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन की लंबाई लगभग 2 मीटर से लेकर 2.70 मीटर तक होती है। डॉल्फिन की आवाज में कंपन होता है, यह अपनी आवाज के माध्यम से ही यह पता लगा लेती है कि शिकार कितनी दूरी पर है। इसकी विशेष प्रकार की आवाज में कंपन होने से इसकी आवाज शिकार से टकराकर वापस आ जाती है, जिससे पता चल जाता है कि शिकार कितनी दूर है।
इसका वजन 100 से 150 किलोग्राम तक होता है। जो पानी के भीतर 10 से 15 मिनट तक रह सकती है, जबकि हर एक-दो मिनट पर सांस लेने के लिए इसे पानी की सतह पर आना पड़ता है।
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